Thursday, October 20, 2011

अच्छा तालिबान बुरा तालिबान

पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क है जो एक ही संगठन तालिबान को दो निगाहों से देखता है। वहां की मीडिया मे अकसर अच्छा तालिबान और बुरा तालिबान लफ़्ज का इस्तेमाल होता है। अच्छे तालिबान से पाकिस्तानियों का आशय उस समूह से है जो भारत और अमेरिका के खिलाफ़ जेहाद करता है। बुरा तालिबान उसे कहा जाता है जो पाकिस्तान के सैनिक प्रतिष्ठानो पर हमले कर रहा है ।तालिबान संगंठन को अमेरिका और पाकिस्तान ने सोवियत फ़ौजो को बाहर खदेड़ने के लिये बनाया था। 

सोवियत सेनाओ के हटने के बाद अफ़गानिस्तान में तालिबान का शासन हो गया और पाकिस्तान ने जेहादियों का रूख भारत समेत दुनिया के अन्य देशो के विरूद्ध कर दिया। जाहिर है ऐसे में जेहाद विरोधी शक्तियों ने कुछ करना ही था सो तालिबान के विरूद्ध लड़ रहे अहमद शाह मसूद को सहायता दी जाने लगी। इसी बीच अलकायदा ने अमेरिका पर हमला कर इस क्षेत्र को एक बार फ़िर युद्ध का मैदान बना दिया।

अब अमेरिका मे यह आम राय बन सुकी है कि पाकिस्तान ने जानबूझ कर अमेरिका को अफ़गानिस्तान मे खींचा था और 9/11  के हमले में आईएसाई का या तो सीधा हांथ था या कह से कम वह इस से वाकिफ़ थी। पाकिस्तान मे ओसामा बिन लादेन के मिलने के बहुत पहले ही यह बात अमेरिका को समझ मे आ चुकी थी कि तालिबान को पाकिस्तान की मदद भी मिल रही है और छ्पने और ट्रेनिंग के लिये सुरक्षित ठिकाने भी और चूकी ऐसे ठिकाने ज्यादातर घनी रिहाईश वाले इलाके हैं अतः उनपर ड्रोन हमले करना भी आसान काम नही है। ऐसे में जब भी अमेरिका पाकिस्तान को इन ठिकानो की खुफ़िया सूचना देता पाकिस्तान उन ठिकानों मे मौजूद आतंकवादियों को वहा से हटने का संदेशा पहुंचा देता। रोज अपने सैनिको के शव उठाता और अपने साथ साथ पाकिस्तान का भी बिल भरता अमेरिका अब यह समझ गया था कि पाकिस्तान पर नकेल कसे बिना उसकी मुक्ती संभव नही। वहीं दूसरी ओर बगुला भगत बना पाकिस्तान आराम से अपने आका और पूरी दुनिया के काका याने अमेरिका की छीछालेदर होता निहार रहा था। जितने ज्यादा से ज्यादा दिन अमेरिका अफ़गानिस्तान में बना रहे पाकिस्तान का उतना ही फ़ायदा इसी मूलमंत्र के आधार पर तो उसने अमेरिका को फ़ंसाया था।


अमेरिका ने इस चाल का तोड़ ऐसे निकाला कि उसने पाकिस्तान के इलाके स्वात और बाजौर से लड़ रहे तालिबान के धड़े तहरीक ए तालीबान पर हमला करने के लिये उसने पाकिस्तान पर जबरदस्त दबाव डाला साथ ही पूरे आपरेशन का खर्चा उठाने और बेहतरीन हथियार उपलब्ध कराने का भी वादा किया। पैसों के लालच में पाकिस्तान जाल में फ़स गया,  उसने हमले शुरू कर दिये। जाहिर है नुकसान उठाने के बाद तहरीक ए तालीबन ने अपनी बंदूंको का मुह पाकिस्तान की ओर मोड़ दिया और दोनो मे लड़ाई छिड़ गयी। अमेरिका ने अगली चाल चली, तहरीक ए तालिबान को अफ़गानिस्तान में सुरक्षित ठिकाने दे दिये  और उसके प्रभाव वाले इलाकॊं जैसे चित्राल आदि से अपने और अफ़गान दोनो  सैनिक हटा दिये। साथ ही पाकिस्तान से सप्लाई लाईन कट जाने के बाद तहरीक ए तालिबान को अफ़गानिस्तान से हथियार आदि मुहैय्या कराना शुरू कर दिया।


अब पाकिस्तान फ़स गया उसके सैनिक ठिकानो और आईएसआई के दफ़्तरों पर आत्मघाती हमले शुरू हो गये साथ ही दरगाहों और गैर सुन्नी मस्जिदों पर भी। पाकिस्तानी कैडर को जिहाद का पाठ पढ़ाना भी भारी पड़ा और पाकिस्तान मे पहले से ही कई समूह थे जिनका मकसद पूर्ण इस्लामिक राष्ट्र की स्थापना था। पाकिस्तान के जमींदार व्यापारी नेता और अफ़सर जाहिर है कि इस्लाम को अपने रूप मे ही लेते हैं और यहां तक की पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल कियानी खुले आम धूम्रपान आदी करते हैं। ऐसे में पाकिस्तानी सेना से तहरीक ए तालीबान को मदद मिलने लगी और उसके सैन्य प्रतिष्ठान हमलो का शिकार होने लगे हद तो तब हो गयी जब करांची के नौसैनिक हवाई अड्डे पर हमला कर जेहादियों ने पाकिस्तान के विमानों को ही उड़ा दिया उससे भी बड़ी बात कि इस हमले मे सेना के अफ़सर और जवान शामिल थे।


खैर अब अमेरिका से पाकिस्तान जब यह अनुरोध करता है कि बुरे तालिबान याने तहरीक ए तालिबान पर हमले करे। तो अमेरिका उससे कहता है कि पहले पाकिस्तान  अच्छे तालिबान याने की हक्कानी नेटवर्क और मुल्ला उमर पर हमले करे। जाहिर है कि पहले ही तहरीक ए तालिबान के कहर से पीड़ित पाकिस्तान अब हक्कानियों का कहर तो झेल नही सकत। सो उसका कहना अब यह है कि हक्कानी समूह पर हमला किये तो नही पर उन्हे बातचीत की टेबल पर लाया जा सकता है।  अमेरिका का यह सोचना है कि बिना हक्कानी समूह को कमजोर किये अगर बातचीत की जायेगी तो बातचीत का वैसा नतीजा नही निकलेगा जैसा अमेरिका चाहता है। फ़िर भी अभी पाकिस्तान,  अमेरिका और तालिबान में बातचीत चल रही है। बातचीत किस दिशा मे जा रही है यह तो नही कहा जा सकता है पर जिस तरह अमेरिका ने वजीरिस्तान सीमा को सील कर उसमे सेना को तैनात कर दिया है। और उधर पाकिस्तान "हमे आपके पैसे नही चाहिये",  "हम परमाणू शक्ती संपन्न देश हैं हमे अमेरिका हल्के मे न ले" ऐसे बयान दे रहा है।

अगले हफ़्ते अमेरिका के सभी विभागो के प्रमुख हिलेरी क्लिंटन के साथ आ रहे हैं। तब फ़ैसला होगा कि दोनो देशो का रूख आगे क्या होगा। भारत का हित तो इसी में है कि पाकिस्तान पर हमले किये जाये और तालीबान को जड़ मूल से खत्म कर दिया जाये। पर देखना यह है कि पाकिस्तान क्या अफ़गानिस्तान बनने की ओर अग्रसर होगा या फ़िर अपनी खुरापात छोड़ कर एक शरीफ़ मुल्क बनना चाहेगा। रास्ता कठिन है और पाकिस्तान की मुल्ला ब्रिगेड का रूख क्या रहता है उस पर निर्भर करता है।

शेष अगले लेख में

Sunday, October 16, 2011

पाकिस्तानी फ़ौज की रणनीति

आज अमेरिका में बूट्स आन ग्राउंड याने पाकिस्तान के नार्थ वजीरिस्तान और बलूचिस्तान पर हमले पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। यह हमला दो तरीको से हो सकता है। ड्रोन और मिसाईलो के जरिये हवाई हमले या इन इलाको को पाकिस्तान से अलग कर नया देश बनाना। मामला दूसरे विकल्प तक भी पहुंचना लगभग तय ही है। बलोचिस्तान में पहले ही पाकिस्तान से अलग होने की जद्दोजहद जारी है। वहां के कीमती खनिजो, तेल, गैस को पाकिस्तान दूसरे मुल्को को खास कर चीन को बेच रहा है।  जाहिर है अमेरिका इन खनिजो पर नजर गड़ाये हुये है।

 पाकिस्तानी सेना की मंशा इस समस्या को अपने हित में करने इस्तेमाल करने की ही रही है। हक्कानी नेटवर्क पर वह हमला कर ही नही सकता हां उसे अमेरिका के साथ बातचीत के लिये जरूर राजी कर सकता है। अभी उसने हालिया तनाव को घटाने के लिये ऐसा किया भी है। पर इस बातचीत का कोई नतीजा निकलना नही है, क्योंकि अमेरिका पाकिस्तान और हक्कानी नेटवर्क तीनो के अपने एजेंडे है।

अमेरिका चाहेगा कि हक्कानी अफ़गानिस्तान में कोई बड़ा पद और पैसे लेकर अमेरिकियों के पाले मे आ जाये। पाकिस्तान यह चाह रहा है कि अमेरिका पाकिस्तान के पिछ्लग्गू  धड़ो को सत्ता सौप आराम से घर चला जाय।  हक्कानी गुट अफ़गानिस्तान  में  इस्लामिक राष्ट्र की पुनः स्थापना करना चाहते है जिसके प्रमुख मुल्ला उमर हों। अमेरिका और हक्कानी एक चीज पर जरूर एकमत हो सकते हैं कि अफ़गानिस्तान को इन जेहादियों का स्वर्ग बना दिया जाये जो चीन के खिलाफ़ जेहाद कर रहे हैं इनमे उईगुर मुसलमान सबसे प्रमुख है। पर जाहिर है पाकिस्तान इस संभावना से बेहद डरा हुआ है। भारत के खिलाफ़ अपने साझा दोस्त चीन से पहले ही उसे इस विषय पर सख्त चेतावनी मिल चुकी है। इसलिये किसी न किसी स्टेज में वह इस वार्ता को सैबोटेज कर देगा,  जैसा कि इससे पहले भी कर चुका है।


इस वार्ता के टूटते ही पाकिस्तान के मीरान शाह और खैबर एजेंसी इलाके में स्थित हक्कानियों के ठिकाने पर अमेरिकी हमले होना तय है। जाहिर सी बात है कि इन हमलो मे बेगुनाह और मासूम भी मारे जायेंगे। आईएसआई इनमें मारे गये लोगो खासकर बच्चो की तस्वीरे पकिस्तान की गैरत ब्रिगेड से जुड़ी मीडिया को मुहैया करा देगी। पाकिस्तान में लोग सड़कों पर निकल आयेंगे, अमेरिका विरोधी लहर को परवान चढ़ने दिया जायेगा और इस्लामाबाद मे स्थित अमेरिका दूतावास पर हमले भी हो सकते हैं। अब आप सोचते होंगे कि जब इतना सब होना तय ही है तो आई एस आई इसे क्यो बढ़ावा देगी और पाकिस्तानी फ़ौज को इससे क्या फ़ायदा।

पाकिस्तान में आज ऐसे कई लोग है जो सुबह शाम दुआये कर रहे हैं कि अल्लाह करे कि अमेरिका हमला करे। जिन लोगो को इस हमलो का इंतजार है उनमे प्रमुख हैं इमरान खान और जनरल परवेज मुर्शरफ़। ऐसे घटना क्रमों के बाद जाहिर है कि सरकार के खिलाफ़ असंतोष फ़ैलेगा और जनता बली का बकरा तलाशेगी जाहिर है फ़ौज तो जिम्मेदारी नही लेगी और पाकिस्तान का मीडिया हर बार की तरह फ़ौज के इशारों में ही चलेगा और सरकार के खिलाफ़ कार्यक्रम प्रसारित होंगे फ़ौज आसिफ़ जरदारी की सरकार को भंग कर इमरान खान और परवेज मुर्शरफ़ की सरकार के लिये जमीन तैयार करेगी। मिया नवाज शरीफ़ जिनकी सरकार को पिछली बार फ़ौज ने भंग कर दिया था और जो पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के बाद पाकिस्तान की जनता के सबसे बड़े विकल्प हैं और जिन्होने मुल्क को फ़ौज के चंगुल से निकालने की कसमे खायी हुयी है और भारत के साथ अमन जिनके एजेंडे मे सबसे उपर हैं उनको किनारे लगाने के लिये यह सब घटनाक्रम तैयार किया जा रहा है।




इन हमलो से हक्कनी समूह को नुकसान तो होगा पर बहुत ज्यादा नही और चूंकि इस हमलो में पाकिस्तानी फ़ौज का हाथ नही होगा तो हक्कानी समूह अमेरिका से ही जंग में लगा रहेगा। और पाकिस्तानी फ़ौज के अफ़सर घटनाक्रम पर नजर रखते रहेंगे।  इस बीच अगले साल तक अमेरिका मे भी राष्ट्रपति चुनाव हो जायेंगे और वहा नयी सरकार आ जायेगी और पाकिस्तान मे भी।  अगले साल के बाद नयी सरकार अमेरिका से संबंधो मे सुधार लायेगी और तब तक  अफ़गानिस्तान  की जंग मे मे किस प्रकार का परिणाम निकलेगा उसका स्वरूप भी सामने आ जायेगा।



शेष अगले लेख में

Thursday, October 13, 2011

हक्कानी नेटवर्क - पाकिस्तान के सर पर लटकती तलवार

आज अमेरिका में पाकिस्तान संबधित नीतियो का निर्धारण करने वाले महत्वपूर्ण व्यक्तियों माईक मलेन, जनरल पेट्रायस, हिलेरी क्लिंटन, कैमरून मंटर ने एक सुर में पाकिस्तान पर हक्कानी नेटवर्क से सांठगांठ रखने का आरोप लगाना शुरू कर दिया है।  इस सांठगांठ को खत्म कर हक्कानी नेटवर्क को खत्म करने या गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी जा रही है। आज तक इन संबधो से इंकार करता आया पाकिस्तान अब खुलेआम पर कूटनीतिक शब्दो में यह कह रहा है कि हक्कानी समूह पाकिस्तान की सर जमीं के बेटे हैं। और अफ़गानिस्तान के भविष्य को तय करते समय हक्कानी समूह के हितो को अनदेखा नही करना चाहिये।  वह यह भी कह रहा है कि अफ़गानिस्तान की जंग शांती प्रक्रिया और बातचीत से खत्म होगी जंग से नही।


 इसके पहले भी अमेरिका पाकिस्तान मे स्थित हक्कानी नेटवर्क से वाकिफ़ था और हक्कानी लड़ाको को सोवियत संघ के खिलाफ़ लड़ने की ट्रेनिंग और हथियार सीआईए ने ही उपलब्ध करवाये थे। पर 9/11  के बाद अफ़गानिस्तान में अमेरिका के हमले के बाद वह मुल्ला उमर के साथ मिल अमेरिकी सेना के खिलाफ़ जंग में शामिल हो गया।  जलालुद्दीन हक्कानी अब अपना कार्यभार अपने बेटे सिराज्जुद्दीन हक्कानी को सौप चुके हैं। सिराज्जुद्दीन हक्कानी के नेत्रुत्व में हक्कानी नेटवर्क के अमेरिका के नाक में दम कर दिया है। हालिया काबुल के अमेरिकी दूतावास पर हुये हमले और जेलब्रेक समेत अनेक घटनाओं में अमेरिका को भारी जान माल क्षती हुयी है।


ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान मे आईएसआई की पनाहगाह में पाये जाने के बाद अमेरिका ने आई एस आई  आपरेटिव्स की जासूसी शुरू की तो यह सनसनीखेज सच सामने आया कि हक्कानी नेटवर्क के हमलो की सारी योजना आईएसआई  बना रही थी। काबुल में हुये हक्कानी नेटवर्क के हमलो की योजना भी न केवल आईएसआई ने बनाई थी बल्कि हमले के दौरान आत्मघाती हमलावरों से आईएसआई के वरिष्ठ अधिकारी  संपर्क में थे और उन्हे पल पल की वे सूचनाएं दे रहे थे जो कि उन्हे अमेरिका से प्राप्त हो रही थी।  इसके बाद जब पाकिस्तान को पेशावर के नजदीक सड़क मार्ग से जा रहे सिराज्जुद्दीन हक्कानी के बेटे नसीरुद्दीन हक्कानी को पकड़ने की सूचना अमेरिका ने पाकिस्तान को दी। तब पाक सेना के जनरल स्तर के अफ़सर उसे अपने साथ ले सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचा आये, यह पूरी घटना अमेरिकी अधिकारी सैटेलाईट के माध्यम से देख रहे थे। इन सब घटनाओं का अमेरिका ने यह निष्कर्ष निकाला है कि पाकिस्तान अमेरिका को अफ़गानिस्तान में रोके रखना चाहता है। और उसके वहां से निकलने की सूरत दो ही शर्त पर संभव है। या तो पाकिस्तान अपनी हरकतों और दोगलेपन से बाज आये या अमेरिका अफ़गानिस्तान को तालिबान के हाथो सौप कर उसे पाकिस्तान के एक स्वायत्त राज्य की तरह बना दे।


दोनो ही सूरते अमेरिका को नामंजूर हैं,  अफ़गानिस्तान को न केवल वह मध्यपूर्व एशिया मे मौजूद पूर्व सोवियत देशो में स्थित तेल पर कब्जा जमाने के अपने बेस के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है बल्कि भविष्य मे 9/11 की तर्ज पर हो सकने वाले हमलों के लिये तालिबान को खुला भी नही छोड़ सकता है। ऐसे में एकमात्र विकल्प पाकिस्तान के उपर हमला ही बचता है।


दूसरी ओर पाकिस्तान भी फ़ंसा हुआ है, अफ़गानिस्तान पर कब्जा जमाने का उसका दशको पुराना सपना भी अब टूट चुका है। और अपनी दोगली चालो में फ़ंस वह तालिबान के एक हिस्से तहरीक ए तालिबान के कहर का शिकार भी हो रहा है। वहीं दूसरी ओर उसकी अर्थव्यवस्था बरबाद है और वह और उसकी फ़ौज अमेरिका के डालरों पर ही निर्भर है। ऐसे में हक्कानी नेटवर्क से संबंध तोड़ उसे खत्म करना ही आसान और कम खतरनाक विकल्प नजर आता है।


लेकिन इससे एक और विकराल समस्या खड़ी हो जायेगी। निश्चित तौर पर हक्कानी समूह पर हमला हक्कानियों की बंदूके पाकिस्तान की तरफ़ मोड़ देगा। हक्कानी समूह से आधी ताकत वाले तहरीक ए तालीबान ने जब पाकिस्तान की यह दुर्गती की हुयी है तो हक्कानियों का सामना करना पाकिस्तानी नेताओ और जनरलों को सपने में भी नजर नही आता है। यह इतना खतरनाक है कि इस्लाम की रक्षा की शपथ लेकर फ़ौज मे शामिल हुये सैनिक और अफ़सर जिनको खुद अमेरिका और पाकिस्तान ने जेहाद की ट्रेनिंग और ब्रेनवाशिंग की हुयी है और जो इस जंग में आज तक हक्कानी और मुल्ला उमर के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस्लाम के तथा्कथित दुश्मनों से लड़े हैं, आसानी से अपने ही आकाओं के खिलाफ़ हो सकते हैं। जिस देश का सैनिक संविधान की नही इस्लाम की रक्षा का हलफ़ उठा कर भर्ती हुआ हो वह इस्लाम के नाम पर ही देश के विमानो को उड़ाने मे भी नही हिचकिचाता। नागरिको और नेताओ के तो कहने क्या, सलमान तासीर की हत्या उनके बाडी गार्ड ने सिर्फ़ इसलिये कर दी थी कि उसके मौलवी ने फ़तवा जारी कर उसे कहा था कि सलमान तासीर अल्लाह की निंदा का दोषी है और उन्हे मारने पर बाडीगार्ड को अल्लाह जन्नत अता फ़रमायेंगे।


इस दोराहे पर खड़ा पाकिस्तान कौन सी राह अपना रहा है यह अगले लेख में।

Saturday, October 8, 2011

अफ़गानिस्तान - एक त्रिकोणीय़ पहेली


  अफ़गानिस्तान आजकल अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छाया हुआ हैं। भारत में इस विषय पर कुछ खास चर्चा नही हो रही और जाहिर है सरकार भी अन्ना और बाबाओं के हाथों अपनी फ़जीहत से बचने में इतनी व्यस्त है कि इस मामले को गंभीरता से संभालेगी इस बात में शक ही नजर आता है।  अफ़गानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई साहब के हालिया  भारत  दौरे के मद्देनजर इस पूरे मामले को समझना इंतिहाई जरूरी और भारत के हितो के लिये महत्वपूर्ण भी है।

आज अमेरिका अफ़गानिस्तान से बाहर निकलने के दौर से गुजर रहा है और वह अफ़गानिस्तान से जीत कर निकलना चाहता है। जाते जाते अमेरिका यहां अपनी पिठ्ठू सरकार को  मजबूत कर जाना चाहता है। पाकिस्तान की यह कोशिश है कि अमेरिका के जाने के बाद अफ़गानिस्तान में उसकी पिठ्ठू सरकार बनें, जिससे उसकी रक्षा पंक्ति को गहराई भी मिल सके और वह तालिबान के लड़ाकों को  हिंदुस्तान के खिलाफ़  इस्तेमाल कर सके।  भारत का हित  कमोबेश अमेरिका के हित के साथ जुड़ा हुआ है।  भारत अफ़गानिस्तान में अपनी पसंद की सरकार बनवाना चाहता है,  ताकि पाकिस्तान उस मोर्चे पर उलझा रहे और भारत के खिलाफ़ तालिबान का इस्तेमाल न कर सके।

इसके अलावा भी बलूचिस्तान जैसे पाकिस्तान के हिस्सों ( जहां कश्मीर की तर्ज पर ही आजादी की जंग चल रही है और हालात कमोबेश कश्मीर से भी बदतर हैं ) के अलगाववादियों की भी भारत अफ़गानिस्तान के रास्ते से मदद कर सकता है। ब्लोच राष्ट्रवादियों को भारत  कश्मीर के विवाद को सुलझाने के लिये एक लीवरेज की तरह काम मे ला सकता है और उन्हे हथियार आदि देकर अपने यहां हुयी आतंकवादी वारदातों का बदला भी चुका सकता है।


इस पूरे मामले को समझने के लिये एक बेहद दिलचस्प पहलू यह भी है कि अमेरिका को अफ़गानिस्तान की जंग में पाकिस्तान ही खींच कर लाया था।  जब तक अमेरिका अफ़गानिस्तान में बना रहे तब तक ही पाकिस्तान को मिलने वाली अमेरिकी मदद की गारंटी भी बनी  रहती है। पाकिस्तान का एक पुराना और बुरा अनुभव यह रहा कि सोवियत रूस के खिलाफ़ जंग में अमेरिका ने पाकिस्तान का इस्तेमाल किया उसकी धरती को जेहादियों का स्वर्ग बना दिया। सोवियत रूस के हट जाने के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को न केवल उसके हाल पर छोड़ दिया बल्कि परमाणू बम के नाम से तमाम प्रतिबंध भी लगा दिये। इससे न केवल पाकिस्तान आर्थिक रूप से तबाह हो गया, बल्कि उसकी फ़ौज के सारे हथियार भी लगभग नकारा हो गये। क्योंकि उनके पुर्जो की सप्लाई भी अमेरिका से ही आनी थी, जिस पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था।

ऐसे में 9/11  को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुये हमले के बाद जब अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन की तलाश शुरू की तो उसने पाकिस्तान से कहा कि मुल्ला उमर पर दबाव डाल करर ओसामा बिन लादेन को अमेरिका के हवाले करवा दे। आप को यह भी ध्यान होगा कि मुल्ला उमर की तालिबानी सरकार पूरी तरह से पाकिस्तान और अरब देशो की सहायता पर ही निर्भर थी और वह पाकिस्तान का कहा नही टाल सकती थी। पर इस वन टाईम डील में पाकिस्तान ने लंबी डील देखी और अमेरिका को फ़िर अफ़गानिस्तान मे फ़साने की ठानी। आईएसआई के मुखिया हामिद गुल अफ़गानिस्तान में मुल्ला उमर के पास अमेरिकियों का संदेश लेकर गये पर उनसे कहा- "कोई नई , ओसामा को बिल्कुल नही देना पहले सोवियत संघ को ठिकाने लगाया और अब इस अमेरिका को भी हम यही ठिकाने लगायेंगे"।

हुआ भी यही मुल्ला उमर ने मना कर दिया और अमेरिका ने पाकिस्तान को धमकी दी कि "आतंक के खिलाफ़ लड़ाई में या तो वह अमेरिका का साथ दे या परिणाम भुगतने को तैयार रहे।"  पाकिस्तान तो तैयार बैठा ही था नवाज शरीफ़ का तख्ता पलट चुके मुशर्रफ़ को अंतराष्ट्रीय मदद और मान्यता, फ़ौज को हथियार और देश को पैसा भी चाहिये ही था। और पाकिस्तान ने अमेरिका से "फ़्रैंड्स नाट मास्टर्स" का समझौता फ़िर कर लिया।फ़िर क्या था धड़ाधड़ पैसा और हथियार पाकिस्तान को मिलने लगे और अमेरिकी अफ़गानिस्तान भर मे ओसामा और मुल्ला उमर को खोजने लगे। पर ओसामा और मुल्ला उमर तो वहां थे ही नही। वे तो पाकिस्तान की गोदी मे बैठे हुये थे, वही पाकिस्तान जो "वार आन टेरर" में अमेरिका का सबसे पक्का दोस्त था। प्यादो को मारने पकड़ने का खेल चलता रहा और अमेरिका पाकिस्तान का बिल भरता रहा।

इसी समय पाकिस्तान ने पहली गलती की, अफ़गानिस्तान में लड़ रहे तालिबान के एक धड़े जो कि पाकिस्तान मे स्वात और बाजौर के इलाके से आपरेट कर रहे थे। रणनीतिक रूप से उन पर हमला करने में अक्षम होने के कारण अमेरिका ने स्वात और बाजौर में यह काम पाकिस्तानियों पर छोड़ दिया। तालिबान की यह इकाई मुल्ला उमर के नियंत्रण से बाहर भी थी। पहले यह तालिबान के धुर विरोधी अहमदशाह मसूद के समर्थन में लड़ चुकी थी। तालिबान के इस गुट पर हमला करना  पाकिस्तान को भारी पड़ गयी और तालिबान का यह हिस्सा आज तहरीक-ए-तालीबान बन कर पाकिस्तान पर कहर बरपा रहा है। पाकिस्तान के सैकिक प्रतिष्ठानों और हालिया करांची नौसेना के एयरबेस पर हुये हमलों मे तालिबान के इसी गुट का हाथ है।