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Tuesday, November 29, 2011

पाकिस्तान पर अमेरिकी हमला- कारण और भविष्य

पाकिस्तान की मोहम्मद एजेंसी इलाके में अमेरिकी हमले मे 24  जवान शहीद हो गये। यह कोई आम हमला नही था और न ही ड्रोन या हेलिकाप्टर द्वारा चलाई गयी एक या दो मिसाइलो द्वारा किया गया हमला। यह हमला पाकिस्तान की दो चौकियों पर हुआ और तकरीबन दो घंटे चला।  पाकिस्तान में इस विषय को लेकर भारी गुस्सा है,  रैलिया निकल रही है।  दूसरी ओर पाकिस्तान की लीडरशिप इस मामले में कड़े बयान जारी कर रही है। बलूचिस्तान स्थित शम्सी एयर बेस को खाली करने का अल्टीमेटम दिया जा चुका है और नाटॊ की सप्लाई लाईन स्थगित कर दी है। दूसरी ओर अमेरिका सैनिको की मौत पर अफ़सोस जाहिर कर चुका है और घटना की जांच करने और नतीजा पाकिस्तानी अधिकारियों को बताने का आश्वासन दे रहा है।


वह बात जो दोनो पक्ष नही कह रहे हैं, वह यह है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को बता दिया है कि वह क्या क्या करने से परहेज नही करेगा। दूसरी ओर पाकिस्तान भी अमेरिका को तेवर दिखा रहा है और मामला अब अमेरिका और पाकिस्तान के बीच टकराव की ओर जा रहा है। इस टकराव की वजह पाकिस्तान की वे नीतिया है जो उसने 9/11  को अमेरिका में हुये आतंकवादी हमले के बाद अपनाई थी। उस वक्त पाकिस्तान ने अमेरिका का साथ देने की बात कही।  लेकिन अंदर खाते उसने  अलकायदा और तालिबान को पनाह दी और उसे अमेरिका पर हमले मे मदद भी की। ऐसा इसलिये हुआ कि पाकिस्तान और अमेरिका के हित अलग थे, पाकिस्तान अफ़गानिस्तान में अपने नियत्रण वाली सरकार बनाना चाहता था। मकसद यह कि वह तालिबान को भारत के विरूद्ध जंग में उपयोग चाहता था। हम भारतीय विमान अपहरण और कंधार में जाकर आतंकवादियो को तालिबान के हवाले करने वाले मामले में देख ही चुके है। दूसरा मकसद अफ़गानिस्तान के अपने नियंत्रण मे होने से पाकिस्तान को डिफ़ेंस इन डेप्थ का फ़ायदा मिलता है।

वहीं अमेरिका अफ़गानिस्तान को आतंकवाद मुक्त और प्रगतीशील देश बनाना चाहता है, किसी भी सूरत में आतंकवाद की पनाहगाह बनने का खतरा वह दूसरी बार नही उठा सकता। दूसरी ओर मध्यपूर्व एशिया के पूर्व सोवियत देशो मे तेल का अथाह भंडार है। जिसे अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के जरिये वह बिना रूस के हस्तक्षेप के बाजार में ला सकता है। तीसरी ओर चीन को घेरने के लिये भी उसे अफ़गानिस्तान पर अपने नियंत्रण वाली सरकार चाहिये।



इन हितो में टकराव पाकिस्तान की दोहरी नीतियो ने मामले को इतने साल उलझाय रखा और अमेरिका को अफ़गानिस्तान में बहुत नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन अब हालात में परिवर्तन आ चुका है ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान मे मिलने के बाद अमेरिका पाकिस्तान की दोहरी चाल समझ गया। अभी तक तालीबान अपने यहा छुपे न होने या कबीलाई लोगो से दुश्मनी मोल न ले सकने के बहाने दे पाकिस्तान डालर भी लेता रहा और तालिबान को मदद भी करता रहा। लेकिन ओसामा केस के बाद अमेरिका ने पूरे मामले को पलट कर देखा तो उसे साफ़ समझ मे आ गया कि माजरा क्या है लेकिन तब नाटो की अस्सी फ़ीसदी सप्लाई पाकिस्तान से ही होकर आती थी।  सो उसने दो काम किये पहला अड़चनो का बहाना दे डालर देना बंद किया दूसरा नाटो का सप्लाई रूट उसने मध्यपूर्व एशिया से बना लिया। अब नाटो की चालीस फ़ीसदी से भी कम सप्लाई पाकिस्तान से आती है और उसने सात महिने का भंडार जमा कर लिया है। अब अमेरिका पाकिस्तान को बिना साथ लिये भी अफ़गानिस्तान का मसला हल कर सकता है।


अब अमेरिका के सामने कोई मजबूरी नही है इसलिये उसने तफ़्सील से इन चौकियों पर हमले किये और सुनिश्चित भी किया कि पाकिस्तान को ज्यादा से ज्यादा नुकसान हो। अब फ़ैसला पाकिस्तान को करना है या तो वो अफ़गानिस्तान का फ़ैसला अमेरिका के हिसाब से होने दे या लड़ाई की राह चुने। जाहिर है लड़ तो वो सकता नही मोलभाव जरूर कर सकता है। पर मोलभाव मे काम मे लिये जा सकने वाले सारे पत्ते उसने पहले ही खो दिये हैं। अब भाव कम मिलेगा और मोल ज्यादा चुकाना होगा। अगरचे वह अमेरिका का समर्थन चाह्ता है तो उसे चीन के खिलाफ़ बन रहे अंतराष्ट्रीय व्यूह मे शामिल होना होगा। ताकि अरब सागर से चीन की सप्लाई बंद हो जाये और इरान अलग थलग पड़ जाये। इसके लिये उसे भारत से कश्मीर पर समझौता भी करना होगा, भारत विरोधी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति को बदलना होगा और अपने यहां से आपरेट कर रहे सभी आतंकवादी समूहो का खात्मा करना होगा।

बीच का रास्ता यह निकल सकता है कि पाकिस्तान भारत से संबंध न सुधारे पर अमेरिका के खिलाफ़ तालिबान को हमले करने से रोके। ऐसे में अफ़गानिस्तान के युद्ध मे काफ़ी पैसे लगा चुके भारत जो अफ़गान सरकार की मदद कर वहा अपनी जड़े जमा चुका है। उसे पाकिस्तान के इलाको खासकर बलूचिस्तान में दखल देने से पाकिस्तान नही रोक सकता। ऐसी सूरत मे विकल्प एक ही बचता है कि पाकिस्तान भारत से दुश्मनी छोड़े या नुकसान उठाये।


आखिरी और अंतिम विकल्प यह है की पाकिस्तान टकराव की राह पर चले। यह टकराव कितना हो यह देखना बाकी है, पर किसी न किसी स्टेज मे पाकिस्तान को चीन और युद्ध तथा अमेरिका और शांती के बीच चुनाव करना ही होगा, उसके विकल्प कम से कमतर होते जा रहे हैं। पहले विकल्प से भारत को कॊई फ़ायदा नही क्योंकि वह तो पहले ही इस अवश्यंभावी युद्ध में अपने को उलझा चुका है। मनमोहन सिंग के नेतृत्व वाली सरकार ने भारत के हित को अमेरिका के हित से मिला दिया है और भारत की मीडिया में प्रतिदिन दिखाये जा रहे चीन विरोधी समाचार इस युद्ध की पूर्व तैयारियां है।युद्ध टल भी गया तो इस राह मे चल होना ही है। जितनी देर से होगा भारतीय पैसे उतने अधिक अमेरिकी हथियारो को खरीदने मे  जाया हो चुके होंगे। पाकिस्तान यदि अमेरिका और शांती को चुन लेता है ’जिसकी संभावना बेहद क्षीण है’,  तो निश्चित ही भारत अपना पूरा ध्यान चीन पर लगा सकेगा।

Sunday, October 23, 2011

पाकिस्तान- अपने बनाये जाल में फ़ंसा देश

आज पाकिस्तान उस पहेली का हल खोज रहा है, जो उसकी खुद की बनाई हुयी है। हिलेरी क्लिंटन ने अपने दौरे में मीडिया से बात करते हुये कहा- "अगर पाकिस्तान और अमेरिका ने मिलकर आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकानो को खत्म नही किया तो इसके अंजाम पाकिस्तान और अमेरिका दोनो के लिये ही बहुत खतरनाक होंगे"। जाहिर है यह एक कूट्नीतिक बयान था और बंद कमरो के पीछे पाकिस्तान को गंभीर अंजाम की चेतावनी दी गयी है। पाकिस्तान ने सोवियत संघ के अफ़गानिस्तान पर कब्जे और उसके बाद हुये जेहाद के वक्त से ही एक सोच अख्तियार कर ली थी कि अब अफ़गानिस्तान को अपना एक स्वायत्त राज्य बनाना है। इसके पीछे डिफ़ेंस इन डेप्थ की अवधारणा थी। भारत से हुये हर युद्ध में भारत पाकिस्तान के लगभग सभी ठिकानो पर हमला कर सकता था जबकि पाकिस्तान भारत के अंदर हमले की बहुत सीमित क्षमता था बंग्लादेश के अलग होने के बाद तो रही सही ताकत भी खत्म हो गयी और आगरा से आगे हमला करना उसके बूते से बाहर हो गया जाहिर है अब भारत अपने संसाधन देश की बाकी हिस्सों मे बना सकता था। अपनी इस कमजोरी को दूर करने के लिये पाकिस्तान ने अफ़गानिस्तान की ओर देखा।


अफ़गानिस्तान में सोवियत सेनाओं के चले जाने के बाद नजीबुल्ला की सरकार बनी। यह सरकार ठीक काम कर भी रही थी, पर यह सरकार पाकिस्तान की पिछलग्गू नही थी। जाहिर है जेहाद में पाकिस्तान ने नुकसान उठाया ही इसिलिये था कि उसे अफ़गानिस्तान पर नियंत्रण चाहिये था। पर अमेरिका ने सोवियत संघ के जाते ही पीठ फ़ेर ली,  उसे पाकिस्तान की रणनीति और समस्याओं से कुछ लेना देना भी नही था। अब पाकिस्तान ने तालिबान को नजीबुल्ला के खिलाफ़ युद्ध मे लगा दिया और काबुल पर तालीबान का कब्जा हो गया।  इस लड़ाई के लिये पैसा और लड़ाके अल कायदा ने इस्लाम के नाम पर ही दिये थे। अलकायदा  का अगला निशाना अमेरिका था और उसने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को तबाह कर दिया और  अमेरिका का दुश्मन नंबर वन बन गया। अब भी पाकिस्तान के पास मौका था वह ओसामा बिन लादेन को अमेरिका को सौप सकता था।  पाकिस्तान पर उन दिनो परमाणू परीक्षण के कारण प्रतिबंध लगे हुये थे और पाकिस्तान की कोई आवश्यकता न होने के कारण अमेरिका भारत की ओर मुड़ रहा था।  पाकिस्तान ने सोचा कि ऐसे में अगर अमेरिका अफ़गानिस्तान मे जंग मे उलझ जाता है तो निश्चित रूप से पाकिस्तान को पैसों और हथियार की  बड़ी इमदाद मिलनी शुरू हो जायेगी और जनरल मुशरर्फ़ की सैनिक सरकार को मान्यता भी मिल जायेगी।


यह बात साफ़ नही है कि उस समय पाकिस्तान ने इस पूरे अभियान की समाप्ति की क्या रूप रेखा सोची थी। अमेरिका की सोच भी उस समय तात्कालिक ही थी उसकी नाक दुनिया के सामने कटी हुयी थी और ओसामा बिन लादेन को मारना उसकी इज्जत का सवाल था। और पाकिस्तान ने भी सोचा होगा कि पानी सर के उपर चढ़ने के समय शीर्ष आतंकवादियो की बली चढ़ा दी जायेगी। पर इस पूरे मामले में पेंच आ गये और अमेरिका ने पाकिस्तान मे मौजूद ओसामा बिन लादेन को खोज लिया। उसके भी पहले अमेरिका यह भी जान चुका था कि पाकिस्तान दोगली चाल खेल रहा है। इसके अलावा भी जिस प्रकार से अमेरिका अफ़गानिस्तान में अपने स्थायी ठिकाने बना रहा है। उससे स्पष्ट है कि पूरी तरह से अफ़गानिस्तान छोड़ने की इसकी योजना नही है। अमेरिका ने अफ़गानिस्तान में भारत को भी एक मुख्य भूमिका सौपी है। आज अफ़गानिस्तान मे चल रहे अभियान को भारत बड़ी आर्थिक सहायता दे रहा है ऐसे मे जाहिर है पाकिस्तान की नींद उड़ चुकी है कहां वह भारत के खिलाफ़ अफ़गानिस्तान को अपना ठिकाना बनाना चाह रहा था और उल्टे भारत ही अफ़गानिस्तान मे आ धमका। ऐसे मे पाकिस्तान की स्थिती सांप छछूंदर सी हो गयी है। उस पर तुर्रा यह कि उसकी दोगली चालो की तर्ज पर अमेरिका ने भी तालिबान के एक धड़े तहरीक ए तालिबान को अफ़गानिस्तान मे सुरक्षित ठिकाना दे दिया है और वहां से तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान पर कहर ढा रहा है।


अब पाकिस्तान का क्या होगा यह पाकिस्तान पर निर्भर नही है फ़िलहाल इसका निर्णय सिराज्जुद्दीन हक्कानी पर निर्भर करता है अमेरिका ने पाकिस्तान से साफ़ कर दिया है कि या तो हक्कानी समूह मुल्ला उमर का साथ छोड़ अमेरिका के साथ हो जाये या पाकिस्तान उसे तबाह कर दे। पाकिस्तान हक्कानी नेटवर्क पर हमला कर ही नही सकता क्योंकि ये हमला उत्तरी वजीरिस्तान के कबीलो को पाकिस्तान के साथ युद्ध में खड़ा कर देगा और पाकिस्तान यह खतरा नही उठा सकता। हक्कानी यह चाहेंगे कि अमेरिका अफ़गानिस्तान से जल्द से जल्द चला जाये और अफ़गानिस्तान पर उनका नियंत्रण हो जाये , पैसे या धमकी का असर उन पर पड़ने की संभावना कम है क्योंकि वे तो जान की बाजी लगा इस्लाम के नाम पर रहे हैं और अमेरिका अब तक उनके सामने कहजोर ही साबित हुआ है। पाकिस्तान चाह रहा है कि अफ़गानिस्तान मे उसकी पिछलग्गू सरकार बने। अमेरिका क्या चाहता है यह साफ़ नही,  पर इस युद्ध मे खरबो डालर उसने खर्च किये हैं तो किसी न किसी आर्थिक उद्देश्य को पूरा करने के लिये ही। पूर्व सोवियत देशो से तेल निकाल कर वह अपने नुकसान की भरपायी कर सकता है। साथ ही चीन के खिलाफ़ जेहादियों को भी समर्थन दिया जा सकता है। फ़िर लीबिया के बाद इरान का तेल भंडार अमेरिका का अगला निशाना तो है ही।

पर सबसे अहम बात होगी अफ़गान क्या चाह रहे हैं। अफ़गान कुछ चाहे न चाहें अर अब वे पाकिस्तान से बेइंतहा नफ़रत जरूर करते हैं। पाकिस्तान की नीतियों ने उन्हे तबाह कर के रख दिया है।  जब जब उनको शांती का अवसर मिलता है तो पाकिस्तान उस अवसर को बिगाड़ने में कोई कसर नही छोड़ता। ऐसे में अफ़गानो ने पाकिस्तान के बलोच विद्रोही नेताओं को अपने यहां बसने और पाकिस्तान पर हमले करने की छूट दे दी है। अब मामला पाकिस्तान के हाथ में तो नही है और भविष्य मे होने वाली घटनाएं हम पर भी गहरा असर डालेंगी।  सबसे बड़ी बात अफ़गानिस्तान मे शांती तभी हो सकती है जब कश्मीर का विवाद सुलझ जाये। जब तक यह विवाद नहीं सुलझेगा तब तक पाकिस्तान भारत को दुश्मन मानता रहेगा और अफ़गानिस्तान में किसी भी तरह का अमन आना मुश्किल है। खैर अमन आ भी जाये तो नफ़रत के बीज जो बोये गये हैं उनसे लंबे समय तक इस क्षेत्र में हिंसा होती ही रहेगी।

अगले लेख में कश्मीर का सच झूठ और भविष्य

Sunday, October 16, 2011

पाकिस्तानी फ़ौज की रणनीति

आज अमेरिका में बूट्स आन ग्राउंड याने पाकिस्तान के नार्थ वजीरिस्तान और बलूचिस्तान पर हमले पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। यह हमला दो तरीको से हो सकता है। ड्रोन और मिसाईलो के जरिये हवाई हमले या इन इलाको को पाकिस्तान से अलग कर नया देश बनाना। मामला दूसरे विकल्प तक भी पहुंचना लगभग तय ही है। बलोचिस्तान में पहले ही पाकिस्तान से अलग होने की जद्दोजहद जारी है। वहां के कीमती खनिजो, तेल, गैस को पाकिस्तान दूसरे मुल्को को खास कर चीन को बेच रहा है।  जाहिर है अमेरिका इन खनिजो पर नजर गड़ाये हुये है।

 पाकिस्तानी सेना की मंशा इस समस्या को अपने हित में करने इस्तेमाल करने की ही रही है। हक्कानी नेटवर्क पर वह हमला कर ही नही सकता हां उसे अमेरिका के साथ बातचीत के लिये जरूर राजी कर सकता है। अभी उसने हालिया तनाव को घटाने के लिये ऐसा किया भी है। पर इस बातचीत का कोई नतीजा निकलना नही है, क्योंकि अमेरिका पाकिस्तान और हक्कानी नेटवर्क तीनो के अपने एजेंडे है।

अमेरिका चाहेगा कि हक्कानी अफ़गानिस्तान में कोई बड़ा पद और पैसे लेकर अमेरिकियों के पाले मे आ जाये। पाकिस्तान यह चाह रहा है कि अमेरिका पाकिस्तान के पिछ्लग्गू  धड़ो को सत्ता सौप आराम से घर चला जाय।  हक्कानी गुट अफ़गानिस्तान  में  इस्लामिक राष्ट्र की पुनः स्थापना करना चाहते है जिसके प्रमुख मुल्ला उमर हों। अमेरिका और हक्कानी एक चीज पर जरूर एकमत हो सकते हैं कि अफ़गानिस्तान को इन जेहादियों का स्वर्ग बना दिया जाये जो चीन के खिलाफ़ जेहाद कर रहे हैं इनमे उईगुर मुसलमान सबसे प्रमुख है। पर जाहिर है पाकिस्तान इस संभावना से बेहद डरा हुआ है। भारत के खिलाफ़ अपने साझा दोस्त चीन से पहले ही उसे इस विषय पर सख्त चेतावनी मिल चुकी है। इसलिये किसी न किसी स्टेज में वह इस वार्ता को सैबोटेज कर देगा,  जैसा कि इससे पहले भी कर चुका है।


इस वार्ता के टूटते ही पाकिस्तान के मीरान शाह और खैबर एजेंसी इलाके में स्थित हक्कानियों के ठिकाने पर अमेरिकी हमले होना तय है। जाहिर सी बात है कि इन हमलो मे बेगुनाह और मासूम भी मारे जायेंगे। आईएसआई इनमें मारे गये लोगो खासकर बच्चो की तस्वीरे पकिस्तान की गैरत ब्रिगेड से जुड़ी मीडिया को मुहैया करा देगी। पाकिस्तान में लोग सड़कों पर निकल आयेंगे, अमेरिका विरोधी लहर को परवान चढ़ने दिया जायेगा और इस्लामाबाद मे स्थित अमेरिका दूतावास पर हमले भी हो सकते हैं। अब आप सोचते होंगे कि जब इतना सब होना तय ही है तो आई एस आई इसे क्यो बढ़ावा देगी और पाकिस्तानी फ़ौज को इससे क्या फ़ायदा।

पाकिस्तान में आज ऐसे कई लोग है जो सुबह शाम दुआये कर रहे हैं कि अल्लाह करे कि अमेरिका हमला करे। जिन लोगो को इस हमलो का इंतजार है उनमे प्रमुख हैं इमरान खान और जनरल परवेज मुर्शरफ़। ऐसे घटना क्रमों के बाद जाहिर है कि सरकार के खिलाफ़ असंतोष फ़ैलेगा और जनता बली का बकरा तलाशेगी जाहिर है फ़ौज तो जिम्मेदारी नही लेगी और पाकिस्तान का मीडिया हर बार की तरह फ़ौज के इशारों में ही चलेगा और सरकार के खिलाफ़ कार्यक्रम प्रसारित होंगे फ़ौज आसिफ़ जरदारी की सरकार को भंग कर इमरान खान और परवेज मुर्शरफ़ की सरकार के लिये जमीन तैयार करेगी। मिया नवाज शरीफ़ जिनकी सरकार को पिछली बार फ़ौज ने भंग कर दिया था और जो पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के बाद पाकिस्तान की जनता के सबसे बड़े विकल्प हैं और जिन्होने मुल्क को फ़ौज के चंगुल से निकालने की कसमे खायी हुयी है और भारत के साथ अमन जिनके एजेंडे मे सबसे उपर हैं उनको किनारे लगाने के लिये यह सब घटनाक्रम तैयार किया जा रहा है।




इन हमलो से हक्कनी समूह को नुकसान तो होगा पर बहुत ज्यादा नही और चूंकि इस हमलो में पाकिस्तानी फ़ौज का हाथ नही होगा तो हक्कानी समूह अमेरिका से ही जंग में लगा रहेगा। और पाकिस्तानी फ़ौज के अफ़सर घटनाक्रम पर नजर रखते रहेंगे।  इस बीच अगले साल तक अमेरिका मे भी राष्ट्रपति चुनाव हो जायेंगे और वहा नयी सरकार आ जायेगी और पाकिस्तान मे भी।  अगले साल के बाद नयी सरकार अमेरिका से संबंधो मे सुधार लायेगी और तब तक  अफ़गानिस्तान  की जंग मे मे किस प्रकार का परिणाम निकलेगा उसका स्वरूप भी सामने आ जायेगा।



शेष अगले लेख में

Saturday, October 8, 2011

अफ़गानिस्तान - एक त्रिकोणीय़ पहेली


  अफ़गानिस्तान आजकल अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छाया हुआ हैं। भारत में इस विषय पर कुछ खास चर्चा नही हो रही और जाहिर है सरकार भी अन्ना और बाबाओं के हाथों अपनी फ़जीहत से बचने में इतनी व्यस्त है कि इस मामले को गंभीरता से संभालेगी इस बात में शक ही नजर आता है।  अफ़गानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई साहब के हालिया  भारत  दौरे के मद्देनजर इस पूरे मामले को समझना इंतिहाई जरूरी और भारत के हितो के लिये महत्वपूर्ण भी है।

आज अमेरिका अफ़गानिस्तान से बाहर निकलने के दौर से गुजर रहा है और वह अफ़गानिस्तान से जीत कर निकलना चाहता है। जाते जाते अमेरिका यहां अपनी पिठ्ठू सरकार को  मजबूत कर जाना चाहता है। पाकिस्तान की यह कोशिश है कि अमेरिका के जाने के बाद अफ़गानिस्तान में उसकी पिठ्ठू सरकार बनें, जिससे उसकी रक्षा पंक्ति को गहराई भी मिल सके और वह तालिबान के लड़ाकों को  हिंदुस्तान के खिलाफ़  इस्तेमाल कर सके।  भारत का हित  कमोबेश अमेरिका के हित के साथ जुड़ा हुआ है।  भारत अफ़गानिस्तान में अपनी पसंद की सरकार बनवाना चाहता है,  ताकि पाकिस्तान उस मोर्चे पर उलझा रहे और भारत के खिलाफ़ तालिबान का इस्तेमाल न कर सके।

इसके अलावा भी बलूचिस्तान जैसे पाकिस्तान के हिस्सों ( जहां कश्मीर की तर्ज पर ही आजादी की जंग चल रही है और हालात कमोबेश कश्मीर से भी बदतर हैं ) के अलगाववादियों की भी भारत अफ़गानिस्तान के रास्ते से मदद कर सकता है। ब्लोच राष्ट्रवादियों को भारत  कश्मीर के विवाद को सुलझाने के लिये एक लीवरेज की तरह काम मे ला सकता है और उन्हे हथियार आदि देकर अपने यहां हुयी आतंकवादी वारदातों का बदला भी चुका सकता है।


इस पूरे मामले को समझने के लिये एक बेहद दिलचस्प पहलू यह भी है कि अमेरिका को अफ़गानिस्तान की जंग में पाकिस्तान ही खींच कर लाया था।  जब तक अमेरिका अफ़गानिस्तान में बना रहे तब तक ही पाकिस्तान को मिलने वाली अमेरिकी मदद की गारंटी भी बनी  रहती है। पाकिस्तान का एक पुराना और बुरा अनुभव यह रहा कि सोवियत रूस के खिलाफ़ जंग में अमेरिका ने पाकिस्तान का इस्तेमाल किया उसकी धरती को जेहादियों का स्वर्ग बना दिया। सोवियत रूस के हट जाने के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को न केवल उसके हाल पर छोड़ दिया बल्कि परमाणू बम के नाम से तमाम प्रतिबंध भी लगा दिये। इससे न केवल पाकिस्तान आर्थिक रूप से तबाह हो गया, बल्कि उसकी फ़ौज के सारे हथियार भी लगभग नकारा हो गये। क्योंकि उनके पुर्जो की सप्लाई भी अमेरिका से ही आनी थी, जिस पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था।

ऐसे में 9/11  को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुये हमले के बाद जब अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन की तलाश शुरू की तो उसने पाकिस्तान से कहा कि मुल्ला उमर पर दबाव डाल करर ओसामा बिन लादेन को अमेरिका के हवाले करवा दे। आप को यह भी ध्यान होगा कि मुल्ला उमर की तालिबानी सरकार पूरी तरह से पाकिस्तान और अरब देशो की सहायता पर ही निर्भर थी और वह पाकिस्तान का कहा नही टाल सकती थी। पर इस वन टाईम डील में पाकिस्तान ने लंबी डील देखी और अमेरिका को फ़िर अफ़गानिस्तान मे फ़साने की ठानी। आईएसआई के मुखिया हामिद गुल अफ़गानिस्तान में मुल्ला उमर के पास अमेरिकियों का संदेश लेकर गये पर उनसे कहा- "कोई नई , ओसामा को बिल्कुल नही देना पहले सोवियत संघ को ठिकाने लगाया और अब इस अमेरिका को भी हम यही ठिकाने लगायेंगे"।

हुआ भी यही मुल्ला उमर ने मना कर दिया और अमेरिका ने पाकिस्तान को धमकी दी कि "आतंक के खिलाफ़ लड़ाई में या तो वह अमेरिका का साथ दे या परिणाम भुगतने को तैयार रहे।"  पाकिस्तान तो तैयार बैठा ही था नवाज शरीफ़ का तख्ता पलट चुके मुशर्रफ़ को अंतराष्ट्रीय मदद और मान्यता, फ़ौज को हथियार और देश को पैसा भी चाहिये ही था। और पाकिस्तान ने अमेरिका से "फ़्रैंड्स नाट मास्टर्स" का समझौता फ़िर कर लिया।फ़िर क्या था धड़ाधड़ पैसा और हथियार पाकिस्तान को मिलने लगे और अमेरिकी अफ़गानिस्तान भर मे ओसामा और मुल्ला उमर को खोजने लगे। पर ओसामा और मुल्ला उमर तो वहां थे ही नही। वे तो पाकिस्तान की गोदी मे बैठे हुये थे, वही पाकिस्तान जो "वार आन टेरर" में अमेरिका का सबसे पक्का दोस्त था। प्यादो को मारने पकड़ने का खेल चलता रहा और अमेरिका पाकिस्तान का बिल भरता रहा।

इसी समय पाकिस्तान ने पहली गलती की, अफ़गानिस्तान में लड़ रहे तालिबान के एक धड़े जो कि पाकिस्तान मे स्वात और बाजौर के इलाके से आपरेट कर रहे थे। रणनीतिक रूप से उन पर हमला करने में अक्षम होने के कारण अमेरिका ने स्वात और बाजौर में यह काम पाकिस्तानियों पर छोड़ दिया। तालिबान की यह इकाई मुल्ला उमर के नियंत्रण से बाहर भी थी। पहले यह तालिबान के धुर विरोधी अहमदशाह मसूद के समर्थन में लड़ चुकी थी। तालिबान के इस गुट पर हमला करना  पाकिस्तान को भारी पड़ गयी और तालिबान का यह हिस्सा आज तहरीक-ए-तालीबान बन कर पाकिस्तान पर कहर बरपा रहा है। पाकिस्तान के सैकिक प्रतिष्ठानों और हालिया करांची नौसेना के एयरबेस पर हुये हमलों मे तालिबान के इसी गुट का हाथ है।